माँसाहार से भी घिनौना शाकाहार -3 [खून की गंगा में तिरती मेरी किश्ती, भाग – 2, प्रविष्टि – 11]

in hive-102880 •  6 days ago 

शक्तिशाली सांडों का अनसुना पहलू

शोषण के दायरे से कोई भी अछूता नहीं है। गाय का पूरा परिवार ही इससे टूट कर बिखर जाता है। चूँकि अब मवेशियों के प्रजनन पर मनुष्य का पूर्ण नियंत्रण है। अतः बिना उसके हस्तक्षेप के प्राकृतिक रूप से आज किसी का प्रजनन नहीं होता है। अपने अनुकूल नस्लों के प्रजनन की चाह अप्राकृतिक प्रजनन की परम्परा ले आई! कोई भी गाय इससे अछूती नहीं है।

नतीजा यह है की हमारे देश की देसी – प्राकृतिक नस्लें (ज़ेबू नस्लें) लुप्त-प्राय हो गई है। चाहे तमिलनाडू की जल्लीकटू हो या आंध्रप्रदेश की ओंगोले, कर्णाटक की कपिला हो या पंजाब की साहिवाल या गुजरात की लाल-सिन्धी नस्ल, ये सभी नस्लें अपने मौलिक – प्राकृतिक रूप में आज देखने को नहीं मिलती। विदेशी जर्सी और होल्स्टीन नस्लें ही डेयरी उद्योग में काम में ली जाती है।

आज उन्नत नस्ल के सांड के वीर्य को इकठ्ठा कर कृत्रिम वीर्य-बैंक बनाये गए हैं, जहाँ एकत्रित कृत्रिम वीर्य को शीतघरों में जमाकर रखा जाता है। कोर्नेल विश्वविद्यालय में हुए एक अध्ययन ने साबित किया है कि इस प्रकार लिक्विड नाइट्रोजन में ठीक से संजोय हुए कृत्रिम वीर्य की उम्र अनंत-काल लम्बी हो सकती है। यानि इसे भविष्य में कभी भी संतानोत्पत्ति के काम में लिया जा सकता है। इस तथ्य ने सांडों के जीवन पर घोर संकट ला खड़ा किया है। अब अगर पर्याप्त मात्रा में वीर्य उपलब्ध है तो फिर हमें नर-बछड़े की बिलकुल आवश्यकता ही नहीं रही!

वीर्य-फार्मों में सांड सबसे हट्टा-कट्टा और बलशाली प्राणी होता है क्योंकि वह अपनी प्रजाति का श्रेष्ठतम चुना हुआ प्राणी होता है। 18 माह की बाल-उम्र से ही उन्हें डेयरी-उद्योग का गुलाम बना दिया जाता है। पचासों सांडों को थोड़ी-सी जगह में ही बाँध दिया जाता है। इन पर नियंत्रण रखने के लिए इन्हें ऐसे बांधा जाता है कि ये अपनी गर्दन भी दायें या बाएं नहीं गुमा पाते। केवल उठना, बैठना या फिर चारा चरने के लिए मुंह को थोड़ा आगे खिसकाने तक इनकी आज़ादी की हद होती है। सप्ताह में चार दिन इन्हें प्रतिदिन दो बार दस मिनट के लिए वीर्य-निष्कासन केंद्र तक लेकर जाया जाता है। वहाँ रखी एक नकली गाय पर इन्हें चढ़ा कर कामोत्तेजित किया जाता है और एक ताप-नियंत्रित कृत्रिम योनि में इन्हें वीर्य स्खलित करने के लिए बाध्य किया जाता है। भारत में अधिकतर इसी विधि से वीर्य को एकत्र किया जाता है। पश्चिमी देशों में विद्युत्कीय-स्खलन विधि का प्रयोग किया जाता है जिसमें सांड के गुर्दे के जरिए उसके गर्भाशय में 12 से 24 वोल्ट के बिजली के झटके देकर वीर्य स्खलीत करवाया जाता है। ये बेहद ही दर्दनाक होता है जिसके लिए पशु को निश्चेत करना आवश्यक है परंतु बिना किसी एनेस्थेसिया के इसे अंजाम दिया जाता है।

इस प्रकार सांड से दस वर्षों तक काम लिया जाता है। उसके बाद उसके वीर्य की गुणवत्ता उम्र के साथ कम होने लगती है। अतः उसे फिर ऊपर वर्णित सेवा-निवृत्त गाय एवं अन्य नर-बछड़ो की तरह बूचडखाने में लगी कतार में भेज दिया जाता है। बूचडखाने एक ‘सेवानिवृत्त’ सांड के पच्चीस से पचास हज़ार रुपये तक दे देते हैं।

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भाग - 2 समाप्त।

आगे पढ़ें,

भाग - 3

श्वेत-क्रांति से निकला नीला-विष

धन्यवाद!

सस्नेह,
आशुतोष निरवद्याचारी

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